‘सृजनोत्सव 2010’: कुछ झलकियां
लेखक : रोहित जोशी (http://naisoch.blogspot.com/2010/07/2010.html ब्लॉग से)उत्तराण्ड के सुदूर जनपद पिथौरागढ़ में बाबा नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती के अवसर पर विगत् 18 और 19 जून को ‘रचनात्मक शिक्षक मंडल’ और लघु कविता पत्रिका ‘विहान’ की ओर से ‘सृजनोत्सव 2010’ मनाया गया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में साहित्यिक व्याख्यान, चर्चाऐं, काव्य पाठ, गजल संध्या, पोस्टर प्रदर्शनी और नाटक की प्रस्तुति की गई। पहले दिन के प्रथम सत्र में अल्वर राजस्थान से आऐ हिन्दी कविता के प्रसिद्ध समालोचक डा0 जीवन सिंह ने ‘कविता की जनपक्षधरता और बाबा नागार्जुन और केदार बाबू की कविताई’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सत्ता की भूख या व्यक्तिगत् अहमन्यता के लिए लिखा गया साहित्य नकली साहित्य है। इसमें मानव और जीवन का ऊपरी चित्रण होता है और यह जीवन की गहराई को नहीं छू पाता है। रचनाकार अपने स्थानीय अनुभवों, देश काल, को अपनी दृष्टि से वैश्विक बना सकता है। जनपक्षधरता शब्द साहित्य में 1936 के बाद समाजवादी आन्दोलनों से आया। लेकिन जनपक्षधरता और प्रतिबद्धता का सवाल राजनीतिक होने से पहले मानवीयता का सवाल है। साहित्य में यह नऐ सौन्दर्यबोध के रूप में भी आया है। कविता में लोकप्रियता और जनपक्षधरता का एक साथ समावेश नागार्जुन और केदारनाथ दोनों के पास ही मिलता है। नागार्जुन की कविताओं में वह इतिहास मिलता है जो जनपक्षधर है। नागार्जुन ने सत्ताधीशों व सत्ता की परिधि में घूमने वालों पर सीधा व्यंग्य किया है। नागार्जुन और केदार बाबू की कविताओं ने वर्तमान की सार्थक आलोचना की है। इनकी कविताओं में वह अन्र्तदृष्टि मौजूद है जो कविता को दीर्घकालिक और सार्वभौमिक बनाती है। वहीं दूसरी ओर एक नई विश्वदृष्टि के अभाव में ही ‘अज्ञेय’ की कविता रहस्यवाद में फंस कर रह जाती है। व्याख्यान के बाद वरिष्ठ इतिहासकार डा0 राम सिंह और कथाकार पंकज बिष्ट ने नागार्जुन के साथ के अपने अनुभवों को श्रोताओं से सांझा किया। इस प्रथम सत्र के बाद श्रोताओं ने साहित्य से सम्बन्धित अपने प्रश्नों पर कथाकार पंकज बिष्ट, डा0 जीवन सिंह और डा0 कपिलेश भोज, से विस्तृत चर्चा की। इस सत्र का संचालन महेश पुनेठा ने किया। इसके बाद के सत्र में कला दर्शन मंच ‘कदम’ के कलाकारों ने विक्रम नेगी के निर्देशन में नागार्जुन की कविता ‘हरिजन गाथा’ पर आधारित नाटक प्रदर्शित किया। शाम के समय में संदीप पाण्डे द्वारा दुष्यन्त और बल्ली सिंह चीमा की ग़जलों के गायन का लोगों ने लुत्फ़ उठाया साथ ही उच्च माध्यमिक विद्यालय तिलढुकरी के विद्यार्थियों ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों पर आधारित रंगमंचीय प्रस्तुति दी।
‘सृजनोत्सव’ के दूसरे दिन ‘समकालीन लेखन एवं यथार्थ’ विषय पर समयांतर के संपादक व वरिष्ठ कथाकार ‘पंकज बिष्ट’ मुख्य व्याख्याकार थे। उन्होंने विषय पर बोलते हुए कहा कि-किसी समय के इतिहास को समझने के लिए उस समय का साहित्य सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने समकालीन लेखन की महत्वपूर्ण रचनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य महत्वपूर्ण रचनाओं से अछूता नहीं है। यशपाल की झूठा सच, भीष्म साहनी के तमस और ओम प्रकाश वाल्मिकी के जूठन, राही मासूम रजा का आधा गांव आदि रचनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने वावजूद इन रचनाओं के हिन्दी साहित्य में उपेक्षित रही ‘भारत विभाजन’ की त्रासदी पर विस्तार से बात रखी। उन्होने श्री लाल शुक्ल की ‘राग दरवारी’ को नगरीय संस्कृति के कारण भ्रष्ट होते समाज का महत्वपूर्ण चित्रण बताया। उत्तराखण्ड के परिवेश पर बात रखते हुए उन्होंने कहा कि- उत्तराखण्ड में पीढ़ियों से सेना में भर्ती हो सहादत की एक लम्बी परम्परा अब नीयति की तरह बन गई है। यह त्रासदपूर्ण है। लेकिन इस पर उत्तराखण्ड से कोई रचना सामने नहीं आ रही है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड के नऐ रचानाकारों को इस पर काम करने की जरूरत है। पंकज बिष्ट के व्याख्यान के बाद कवि डा0 कपिलेश भोज ने लेखन के समकालीन परिदृश्य पर बोलते हुए कहा कि- प्रतीयमान यथार्थ के बजाय रचनाकार को वास्तविक यथार्थ को पकड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि बड़े सपने के बिना कोई बड़ा रचनाकार नहीं हो सकता है। इस सत्र का संचालन अनिल कार्की द्वारा किया गया।
दूसरे दिन के दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें राजेश पन्त, राजीव जोशी, नवीन विश्वकर्मा, हेम बहुगुणा, दिनेश भट्ट, भवानी शंकर काण्डपाल, अनिल कार्की, विक्रम नेगी, आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। काव्यपाठ के बाद कविता के समालोचक डा0 जीवन सिंह, व कवि कपिलेश भोज ने कविताओं की विस्तार से समीक्षा करते हुए इनमें कई कवियों को बड़ी सम्भावनाओं का कवि बताया। पूरे कार्यक्रम में सतीश जोशी के कविता पोस्टर आकर्षण का केन्द्र बने रहे। कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों की ओर से दिनेश भट्ट ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल, गोविन्द कफलिया, जगत मर्तोलिया, आशुतोश पाण्डेय, कंचन जोशी, रूपेश डिमरी, दीपा पाटनी, विनोद बसेड़ा, कमल किशोर, भुवन चन्द्र पाण्डे, गिरिजा जोशी, बुद्धिदेव पाण्डे, चन्दन डसीला, किशोर पाटनी, महिमन दिगारी, अभिषेक पुनेठा, लता जोशी, आदि जनपद के साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।
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