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Monday, 6 February 2012

सृजनोत्सव २०१० : आयोजक- विहान + रचनात्मक शिक्षक मंडल

मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना ही जनपक्षधरता है

प्रस्तुति : राजीव जोशी
साहित्य, संगीत, कला जैसे विविध क्षेत्रों में रचनात्मकता का माहौल तैयार करने और जनपक्षीय साहित्य की समझ पैदा करने के उद्देश्य से 18 व 19 जून को पिथौरागढ़ के नगरपालिका सभागार में ‘रचनात्मक शिक्षक मण्डल’ व ‘विहान’ परिवार की ओर से ‘सृजनोत्सव 2010’ का आयोजन किया गया। आयोजन के मुख्य वक्ता मशहूर समालोचक डॉ. जीवन सिंह, ‘समयान्तर’ के संपादक पंकज बिष्ट व साहित्यकार डॉ. कपिलेश भोज थे। बाबा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल व अज्ञेय की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य पर आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र में डॉ. जीवन सिंह ने ‘कविता की जनपक्षधरता व बाबा नागार्जुन व केदार बाबू की कवितायें’ विषय पर बोलते हुए कहा कि आम जन के पक्ष के विषयों में रचा जाने वाला साहित्य ही वास्तविक साहित्य है, जबकि सत्ता और शक्तिसम्पन्न वर्ग की प्रशंसा के लिये रचा गया साहित्य नकली साहित्य है। उन्होंने मात्र लोकप्रियता के लिये लिखने वाले रचनाकारों को चुनौती देते हुए कहा कि व्यंग करना है तो बाबा नागार्जुन की तरह ताकतवर पर करो। इमरजेन्सी काल में चौपालों में गायी बाबा की कविताओं व केदार बाबू की कविताओं का उदाहरण दे-देकर उन्होंने कहा कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना ही जनपक्षधरता है। उन्होंने अज्ञेय को कुशल शब्द शिल्पी बताया। पंकज बिष्ट ने कॉफी हाउस की देर रात तक की बहसों और नागार्जुन के साक्षात्कार के दौरान बिताये पलों की स्मृतियाँ बाँटते हुए कहा कि बन्द कमरों में शब्दों की सौदागरी करने वाले साहित्यकारों के दौर में वे आमजन की लड़ाइयों में सक्रिय साहित्यकार थे। कोई भी समकालीन जनान्दोलन ऐसा नहीं था जिस पर नागार्जुन की कलम न चली हो। डॉ. राम सिंह ने बाबा के पिथौरागढ़ प्रवास के दौरान उनके घर में बिताये पलों को याद किया और शिक्षकों द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को अपने तरह का पहला प्रयोग बताते हुए शुभकामनायें दी। सत्र का संचालन महेश पुनेठा ने किया।
दूसरे सत्र में अतिथियों से सवाल-जवाब के क्रम में डॉ. कपिलेश भोज ने कहा कि साहित्य इसलिये पढ़ना चाहिये, क्योंकि यह हमारी संवेदना का विस्तार करता है। साहित्यविहीन व्यक्ति अपनी छोटी दुनिया में कैद होकर कुंठित हो जाता है। साहित्य मुक्ति का मार्ग बताता है और समाज को सरोकारों से जोड़ता है। पंकज बिष्ट ने एक कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि ‘साहित्य में तिथियों के अलावा सब सच होता है जबकि इतिहास में तिथियों के अलावा कुछ भी सच नहीं होता।’ उन्होंने कहा कि वाल्मीकी या प्रेमचन्द के साहित्य से तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिवेश के दृश्य स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं। साहित्य संवेदना का विस्तार करता है। लोकभाषा का किसी रचनाकार के लिये क्या महत्व है ? डॉ. जीवन सिंह का जवाब था कि अपने लोक से कटकर कोई कवि जनपक्षीय नहीं हो सकता, किन्तु मात्र लोक-भाषा के प्रयोग से भी कोई रचना जनपक्षीय नहीं हो सकती। उन्होंने तुलसी मीरा के साहित्य का उदाहरण देकर कहा कि लोकभाषा में रचे जाने के बावजूद इनके साहित्य की मूल ताकत भक्ति-भावना थी।
सायंकालीन सत्र में राजकीय प्रा. वि. तिलढुंगरी के छात्रों द्वारा केदारबाबू की कविता ‘आसमान की ओड़े चुनरिया, धानी पहने फसल घघरिया’ कविता पर नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसे भुवन पाण्डे, गिरिजा जोशी व बुद्धिबल्लभ पाण्डे ने संगीतबद्ध किया। ‘कदम’ के बाल कलाकारों की विक्रम नेगी द्वारा निर्देशित बाबा नागार्जुन की कविता ‘हरिजन गाथा’ की मंचीय नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को प्रभावित किया। संदीप पाण्डे व भुवन पाण्डे ने बल्ली सिंह चीमा व दुष्यन्त कुमार की गजलों को प्रस्तुत कर समाँ बाँध दिया। युवा शिक्षक सतीश जोशी के कविता पोस्टरों से पटी पड़ी नगरपालिका हॉल की दीवार पर हर वक्त दर्शकों की भीड़ दिखी।
दूसरे दिन ‘समकालीन लेखन व यथार्थ’ विषय पर बोलते हुए पंकज बिष्ट ने कहा कि वर्तमान दौर में रोटी, कपड़ा, मकान, जल-जंगल-जमीन जैसे मूलभूत सवालों पर हो रहे संघर्षों को उद्घाटित नहीं होने दिया जा रहा है। पूँजीवादी साहित्यिक संस्थान व मीडिया आम जन की लड़ाई को ढँक कर सच को विकृत कर रहे हैं। डॉ. कपिलेश भोज ने कहा कि आज आभासी यथार्थ से बचते हुए परत दर परत यथार्थ को उघाड़ने की जरूरत है। वास्तविक मुद्दे पीछे छूट रहे हैं जो वास्तविक लेखन है उसे हतोत्साहित कर सामने नहीं आने दिया जा रहा है। इसी शाम उदीयमान कवियों के लिये काव्य पाठ का भी आयोजन किया गया। इसमें नाचनी से राजीव जोशी, मुनस्यारी से राजेश पन्त, गंगोलीहाट से रोहित जोशी, अल्मोड़ा के हेम बहुगुणा, पिथौरागढ़ के भवानी शंकर, अमिल कार्की, विक्रम नेगी, दिनेश भट्ट व गुमनाम विश्वकर्मा ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत की। बाहर से आये अतिथियों ने माना कि इन युवा कवियों में जनपक्षीय चेतना और भविष्य के लिये संभावनायें दिखाई देती हैं। कार्यक्रम के अंत में मंडल के जिला संयोजक दिनेश भट्ट ने सबको धन्यवाद दिया। 
http://www.nainitalsamachar.in/srijanotsav-2010-at-pithoragarh/
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