| केदार-नागार्जुन की जन्मशती |
उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में १८ व १९ जून को दो दिवसीय सृजनोत्सव' का आयोजन हुआ । पिथौरागढ़ में आयोजित साहित्य, संगीत व कला के इस कार्यक्रम में केदारनाथ अग्रवाल तथा नागार्जुन की कविताओं पर चर्चा-परिचर्चा के साथ उनकी कविताओं की रंगमंचीय प्रस्तुति भी हुआ। साथ ही स्थानीय युवा कवियों द्वारा काव्यपाठ और उनकी कविताओं पर आमंत्रिात साहित्यकारों द्वारा टिप्पणी की गई। रचनात्मक शिक्षक मंडल और विहान पत्रिाका की ओर से रचनात्मकता का माहौल तैयार करने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में आलोचक डॉ. जीवन सिंह, कथाकार पंकज विष्ट तथा साहित्यकार डॉ. कपिलेश भोज प्रमुख वक्ताओं के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम छह सत्राों में बंटा था। प्रथम सत्रा में' कविता की जनपक्षधरता और केदार बाबू व बाबा नागार्जुन की कविताई' पर डॉ. जीवन सिंह ने व्याख्यान दिया । इस विषय पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि आम जन के पक्ष में रचा जाने वाला साहित्य ही वास्तविक साहित्य है, जबकि सत्ता और शक्ति संपन्न वर्ग की प्रशंसा में लिखा जाने वाला साहित्य नकली साहित्य है। हिंदी साहित्य में नकली साहित्य बहुत लिखा गया है जो सत्ता की भूख तथा पैसा की प्राप्ति के लिए लिखा गया साहित्य है। डॉ. सिंह ने नागार्जुन का मिथिला और केदार बाबू का बुंदेलखंड की ध्रती से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि जो कविता अपनी जमीन से नहीं जुड़ी होती है वह पनप नहीं सकती है। अंत में समयांतर के संपादक पंकज विष्ट ने कॉपफी हाउस की देर रात तक की बहसों और नागार्जुन के साथ बिताए पलों की स्मृतियों को बाँटते हुए कहा कि बंद कमरों में शब्दों की सौदागरी करने वाले साहित्यकारों के दौर में वे आमजन की लड़ाइयों में सक्रिय साहित्यकार थे। कोई भी समकालीन जनांदोलन ऐसा नहीं था जिस पर नागार्जुन की कलम न चली हो। इससे पूर्व इतिहासकार डॉ. रामसिंह ने बाबा के पिथौरागढ़ प्रवास के दौरान उनके द्घर में बिताए पलों को याद करते हुए कहा कि बाबा जितने बड़े रचनाकार थे उतने ही बड़े इंसान भी। इस सत्रा का संचालन युवा साहित्यकार महेश चंद्र पुनेठा ने किया। पहले दिन के दूसरे सत्रा में साहित्य पर सवाल-जवाब हुए। आमंत्रिात तीनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने साहित्य पाठकों तथा स्थानीय रचनाकारों के सवालों के जवाब दिए। जैसे हमें साहित्य क्यों पढ़ना चाहिए ? इसके उत्तर में डॉ. कपिलेश भोज ने कहा कि साहित्य हमारी संवेदना का विस्तार करता है। हमें हमारे संसार से बाहर की दुनिया से मिलाता है तथा मुक्ति का मार्ग दिखलाता है। इसलिए साहित्य पढ़ा जाना चाहिए। इस सत्रा का संचालन रचनात्मक शिक्षक मंडल के संयोजक सचिव राजीव जोशी ने किया। प्रथम दिवस के सायंकालीन सत्रा का मुख्य आकर्षण केदार व नागार्जुन की कविताओं से संबंधित रंगमंचीय प्रस्तुति रही। सर्वप्रथम शिक्षक भुवन चंद्र पांडे, गिरिजा कुमार जोशी व बु(ि देव पांडे द्वारा केदारनाथ अग्रवाल के गीतों-आसमान की ओढ़े चुनरिया, धनी पहने पफसल द्घद्घरिया, धूप धरा पर उतरी आदि पर नृत्य प्रस्तुत किया गया। बाबा नागार्जुन की कविता 'हरिजन गाथा' की इस नाट्य प्रस्तुति को उपस्थित दर्शकों ने खूब सराहा। इस अवसर पर युवा शिक्षक संदीप पांडे ने दुष्यंत कुमार और बल्ली सिंह चीमा की ग़८ालों का गायन किया। इस सत्रा का संचालन युवा कवि अनिल कार्की ने किया। दूसरे दिन के प्रथम सत्रा में 'समकालीन लेखन व यथार्थ' विषय पर पंकज विष्ट ने कहा कि किसी समय के इतिहास को समझने के लिए उस समय का साहित्य सबसे महत्वपूर्ण होता है। साहित्य का काम अपने समय और समाज को अभिव्यक्त करना है। एक रचनाकार को अपने समय की विडंबनाओं को पकड़ना चाहिए और अभिव्यक्त करना चाहिए। वर्तमान दौर में रोटी, कपड़ा, मकान और जल, जंगल, जमीन जैसे मूलभूत सवालों पर हो रहे संद्घर्षों को उद्द्घाटित नहीं होने दिया जा रहा है। पूंजीवादी साहित्यिक संस्थान और मीडिया आम जन की लड़ाई को ढककर सच को विकृत कर रहे हैं। दूसरे सत्रा में स्थानीय युवा कवियों द्वारा काव्यपाठ किया गया। इसमें जनपद के विभिन्न अंचलों से आए कवियों ने भाग लिया। काव्यगोष्ठी में राजीव जोशी, राजेश पंत, रोहित जोशी, हेम बहुगुणा, भवानी शंकर कांडपाल, अनिल कार्की, विक्रम नेगी, दिनेश भट्ट तथा नवीन विश्वकर्मा ने अपनी प्रतिनिध्ि कविताएँ सुनाईं। इस सत्रा का संचालन युवा कवि विक्रम नेगी ने किया। अंतिम सत्रा में आमंत्रिात साहित्यकारों ने युवा कवियों की कविताओं की विशिष्टताओं और सीमाओं की ओर उनका ध्यान खींचते हुए कहा कि इन कवियों में उन्हें जनपदीय चेतना एवं जनपक्षध्रता दिखाई देती हैं जो भविष्य के प्रति आशान्वित करती हैं। कार्यक्रम के अंत में रचनात्मक शिक्षक मंडल के जिला संयोजक युवा साहित्यकार दिनेश भट्ट ने सभी का आभार व्यक्त किया। |
Tuesday, 13 March 2012
विहान और रचनात्मक शिक्षक मंडल द्वारा आयोजित सृजनोत्सव (केदार-नागार्जुन की जन्मशती) पर पाखी पत्रिका की रिपोर्ट.
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